प्रश्न : ‘‘वर्तमान-काल के स्थलरूपों में सरलता की अपेक्षा जटिलता अधिक है।’’ सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
(2015)
उत्तर : धरातल पर मौजूद स्थलरूप लाखों वर्षों के विकास का परिणाम होते हैं। सामान्यतः अंतःजनिक कारक इनके निर्माण के लिए उत्तरदायी होते हैं, जबकि बार्हजनक कारक इनका अपरदन एवं निक्षेपण करते हैं तथा वर्तमान स्थलाकृतियों की प्राप्ति होती है।
हाल में मानवीय क्रियाकलापों ने इन स्थलरूपों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है तथा इनके स्वाभाविक विकास को अस्थिर किया है। इसे कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। नदी प्रायः एक ऊंचे स्थान से शुरू होकर ....
प्रश्न : सोदाहरण व्याख्या कीजिए कि चैनल गतिकी जलोढ़ पंखों एवं शंकुओं के विकास के लिए किस प्रकार उत्तरदायी बनी रही है।
(2015)
उत्तर : नदियों के जल आयतन, वेग और अवसादों को ढोने की क्षमता को जल गतिकीयता कहते हैं। नदियों के वेग में वृद्धि होने से उनमें अपरदन क्षमता एवं अवसाद ढोने की क्षमता में वृद्धि होती है। ढाल प्रवणता तीव्र होने से वेग में वृद्धि होती है।
सामान्यतया जब नदियां पहाड़ी क्षेत्रें से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं तो इनकी तीव्रता कम हो जाती हैं। इसके फलस्वरूप इनमें अपरदात्मक क्षमता एवं अवसाद ढ़ोने की क्षमता में कमी ....
प्रश्न : भू-आकृति विज्ञान में, भू-पृष्ठीय अनाच्छादन के अमेरिकी संप्रदाय के योगदानों की विवेचना कीजिए।
(2015)
उत्तर : भू-आकृति विज्ञान के क्षेत्र में अमेरिकन संप्रदाय का योगदान सर्वाधिक माना जाता है। 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण एवं 20वीं सदी के प्रारंभ में इसका सर्वाधिक विकास हुआ। इसी समय भू-आकृति विज्ञान के मूलभूत विषय-स्थलरूपों के विकास को निश्चित रूप प्रदान किया गया तथा उनके विकास में चक्रीय अवस्था का अवलोकन किया गया। अमेरिकन संप्रदाय में पॉवेल, गिल्वर्ट, डट्टन तथा डेविस को अग्रणी माना जाता है। डेविस ने विभिन्न संकल्पनाओं का समेकन करके इस विज्ञान ....
प्रश्न : कटिबंधीय दृष्टिकोण से भू-आकृतिक प्रक्रमों का वर्गीकरण लिखिए।
(2015)
उत्तर : भू-आवृतिक प्रक्रम अपक्षय, अपरदन एवं अवसादीकरण का प्राकृतिक कारण है, जिसके द्वारा सतही पदार्थों एवं स्थल रूपों का रूपांतरण संभव होता है। भू-आकृतिक प्रक्रमों का कटिबंधीय वर्गीकरण जलवायु भू-आकारिकी की संकल्पना पर आधारित है। किसी खास प्रकार की जलवायु में खास तरह के प्रक्रम सक्रिय होते हैं, तथा स्थल रूपों का निर्माण होता है। इस आधार पर इसे निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-
प्रश्न : अपक्षय (वेदरिंग) और वृहत् क्षरण (मास वेस्टिंग) की व्याख्या कीजिए तथा उनके भू-आकृतिक महत्व का वर्णन कीजिए।
(2014)
उत्तर : किसी स्थान विशेष पर यथावत चट्टानों का टूटना तथा विघटन अपक्षय कहलाता है, यह एक स्थैतिक प्रक्रिया है। इसमें टूटे हुए चट्टान के चूर्ण के परिवहन को शामिल नहीं किया जाता। इसमें चट्टानें विघटन तथ वियोजन द्वारा विदीर्ण होकर अपने ही स्थान पर बिखर जाती हैं। अपक्षय के दो प्रकार होते हैं-
प्रश्न : अपरदन पृष्ठों की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए और उनके विकास के उत्तरदायी कारकों पर प्रकाश डालिए।
(2014)
उत्तर : अपरदन सतहों का संबंध उन लगभग समतल या लहरदार मैदानों (Undulating Plains) से है जिनका विकास अपरदन चक्र के परिणामस्वरूप हुआ है, अपरदन सतहें भौतिक स्थलरूपों का वह महत्वपूर्ण अंग होती हैं, जिनका विकास पेनीप्लेनेशन, पेडीप्लेनेशन, पैनप्लेनेशन, सागरीय अपरदन आदि के द्वारा होता है।
विभिन्न प्रकार के अपरदन प्रक्रमों के सापेक्ष अपरदन सतहों के स्वरूप में भी भिन्नता पाई जाती है।
जहां भू-पटल में तापन कम हुआ है वहां पुरानी अपरदन सतहों के ....
प्रश्न : प्लेट विवर्तनिकी (प्लेट टेक्टॉनिक्स) की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए। यह हिमालय और अपालेशियन पर्वतों के विरचन की व्याख्या करने में किस प्रकार सहायक हैं?
(2014)
उत्तर : क्रस्ट और मेण्टल के ऊपरी परत से निर्मित ठोस परत को स्थलमण्डल कहते हैं, जिसके वृहद खण्ड को प्लेट कहते हैं। प्लेटों की सीमाओं के मघ्य होने वाली अन्योन्य क्रियाओं के द्वारा प्लेट के आन्तरिक भागों में होने वाले विरूपण को ही प्लेट विवर्तनिकी कहते हैं।
प्लेट विवर्तनिकी क्रिया प्लेट के मध्य सापेक्ष संचलन के कारण होती है। यह सापेक्ष संचलन 3 किनारों पर होता है-
अपसारी प्लेट सीमाओं में दो ....
प्रश्न : शब्द ‘विसर्प’ (मिऐन्डर) की परिभाषा दीजिए तथा गभीरीभूत विसर्प (इनट्रेंच्ड मिऐन्डर) और अंतःकर्तित विसर्प (इन्ग्रोन मिऐन्डर) के बुनियादी अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
(2014)
उत्तर : विसर्प नदी की प्रौढ़ावस्था मैदानी भागों में बनती है तथा यह नदी की अनुप्रस्थ आकृति से संबंधित है। मैदानी भागों में भूमि के असमतल होने से नदी के प्रवाह बाधित होता है। जिसके कारण निम्नीकृत अपरदन की अपेक्षा क्षैतिज अपरदन अधिक प्रभावी होने लगता है। इससे नदी के प्रवाह में छोटे-छोटे मोड़ पड़ जाते हैं। प्रत्येक मोड़ के अवतल किनारे पर अपरदन होता है। उत्तल किनारे पर निक्षेपण होता है जिससे अवतल किनारों में क्लिफ ....
प्रश्न : अत्यंत नूतन हिमकाल का पृथ्वी की पर्पटी पर प्रभाव।
(2013)
उत्तर : अत्यंत नूतन हिमकाल (Pleistocene) शीत युग में पृथ्वी पर इतनी बर्फ थी जिसका भू-पर्पटी पर कई प्रकार से असर हुआ। इस काल में भू-पर्पटी पर मौजूद पहाड़ एवं सुन्दर स्थलाकृतियां जल के बहाव के कारण नहीं वरन् हिमनियों के द्वारा होने वाले अपरदन एवं निक्षेपण के कारण बने हैं।
इस काल में बहुत ही कम समय में स्थलाकृतियों में जबरदस्त परिवर्तन आये। इस काल में अमेरिका के ग्रेट लेक्स एवं उत्तरी यूरोप के बाल्टिक सागर का ....
प्रश्न : डेविस के प्रसामान्य चक्र और शुष्क चक्र के बीच अंतर।
(2013)
उत्तर : प्रसामान्य अपरदन चक्र एवं शुष्क अपरदन चक्र की संकल्पना अमेरिकी भूगोलवेत्ता डब्लू.एम. डेविस द्वारा प्रस्तुत की गई थी। सामान्य अपरदन चक्र को नदीय अपरदन चक्र के नाम से भी जाना जाता है, जो मध्य अक्षांशीय क्षेत्रें में नदियों द्वारा अपरदन की क्रिया के परिणाम स्वरूप बनता है, जबकि शुष्क अपरदन चक्र, अपरदन चक्र की एक आदर्श स्थिति है, जो मरूस्थलों में ही संभव हो सकती है। सामान्य एवं शुष्क अपरदन चक्र में निम्नलिखित अंतर हैं-
प्रश्न : महाद्वीपीय विस्थापन का पुराजीवी हिमानी प्रभाव।
(2012)
उत्तर : प्रो- अल्फ्रेड वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत में महासागरों की तली तथा महाद्वीपों की स्थिरता की संकल्पना को गलत प्रमाणित कर अपनी प्रतिस्थापन परिकल्पना का प्रतिपादन किया। वेगनर की मूलभूत समस्या थीµ जलवायु सम्बन्धी परिवर्तन। भूमण्डल पर अनेक क्षेत्रें में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनके आधार पर यह ज्ञात होता है कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय-समय पर अनेक परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों को दो रूपों में स्पष्ट किया जा सकता हैः
प्रश्न : ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत में बोस और हाल्डेनहैंग के योगदान की व्याख्या कीजिए।
(2012)
उत्तर : ढाल के विकास से संबंधित ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन वाल्टर पेंक ने किया। पेंक ने भी ढालों के विकास को प्रवाही जल के अपरदन चक्र के संदर्भ में ही समझाया। लेकिन डेविस की अवस्थाओं को अस्वीकार करते हुए प्रावस्था (Phases) को महत्व दिया। पेंक की प्रावस्था में उत्थान एवं अपरदन की दर की अर्न्तसम्बन्धों की व्याख्या किया गया है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास विभिन्न दशाओं में होता है और प्रत्येक दशा में ....
प्रश्न : मानक अधिपृष्ठजन अपरदन-चक्र की विशेषता।
(2012)
उत्तर : सर्वप्रथम स्काटिश भूविज्ञानवेत्ता जेम्स हट्टन ने 1785 में भूविज्ञान क्षेत्र में चक्रीय पद्धति का अवलोकन किया। जेम्स हट्टन द्वारा प्रतिपादित फ्न तो आदि का कोई लक्षण है और न अन्त का भविष्यय् अन्ततः पृथ्वी के इतिहास की चक्रीय पद्धति की संकल्पना में परिणत हो गया।
बाद में अमेरिकी विद्धान विलियम मोरिस डेविस ने ‘अपरदन चक्र की संकल्पना का प्रतिपादन किया। डेविस के अनुसार किसी भी स्थलाकृति का निर्माण तथा विकास एतिहासिक क्रम में होता है, जिसके ....
प्रश्न : भूचुंबकत्व एवं पुराचुंबकत्व
(2011)
उत्तर : पृथ्वी के चुंबकीय गुण विशेष रूप से चुंबकीय क्षेत्र तथा उससे संबद्ध तथ्यों के अध्ययन को भूचुंबकत्व कहते हैं। पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण बाह्य क्रोड के धात्विक गुण आयनीकृत हो जाते हैं, जिससे उत्सर्जित ऊर्जा विद्युत तरंगों में परिवर्तित हो जाती है।
इसी ऊर्जा से पृथ्वी में चुंबकीय गुणों का जन्म होता है। पृथ्वी का सबसे प्रमुख चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी का क्रोड है। इसके अतिरिक्त उत्तरी एवं दक्षिणी चुंबकीय ध्रुव दो अन्य ....
प्रश्न : अपरदन के जलवायु द्वारा नियंत्रित कारकों के नाम बताइये। स्पष्ट कीजिए कि वे द्रव्य के गुण धर्मों की दृष्टि से किस प्रकार एक-दूसरे से भिन्न हैं? उनमें से प्रत्येक द्वारा निर्मित स्थल रूपों की तुलना करें।
(2011)
उत्तर : अपरदन अनाच्छादन क्रिया का एक भाग है। अनाच्छादन में अपरदन एवं अपक्षय दोनों को शामिल किया जाता है, परंतु जहां अपक्षय केवल स्थैतिक क्रिया है। वहीं अपरदन में गतिशील क्रिया होती है। अपक्षय के अंतगर्त चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। जब इसमें चट्टानों के परिवहन को शामिल किया जाता है। तो वह अपरदन कहलाता है।
अपरदन ....
प्रश्न : समस्थिति की संकल्पना को ऐयरी और प्राट द्वारा उसके अभिग्रहण के अनुसार स्पष्ट करें?
(2011)
उत्तर : पृथ्वी के भूपृष्ठ पर स्थापित या कार्यरत भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता की दशा जो पृथ्वी के ऊपर उठे हुए भागों पर्वत, पठार, मैदान तथा गहराई में स्थित भागों सागर या महासागर के मध्य पाई जाती है। जिससे पृथ्वी के ऊंचे-ऊंचे भाग संतुलित अवस्था में बने रहते हैं। यह संतुलन की अवस्था ही समस्थिति है।


प्रश्न : कार्स्ट स्थलाकृति के विकास के लिए आवश्यक दशाएं।
(2010)
उत्तर : इसके निर्माण तथा विकास के लिये एकमात्र चूना-पत्थर शैल की उपस्थिति ही नहीं आवश्यक है, वरन् कई ऐसी आवश्यक दशाएं हैं, जिनके होने पर ही वास्तविक कार्स्ट स्थलाकृतियों का विकास हो पाता है। यहां तक कि चूना-पत्थर शैल की स्थिति भी विशेष प्रकार की होनी चाहिए। साधारण तौर पर अग्रलिखित दशाएं कार्स्ट के लिये अधिक आवश्यक होती हैं:
प्रश्न : भूगर्भ की संरचना के निर्धारण में भूंकपी अध्ययन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
(2010)
उत्तर : पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय से संबंधित परंपरागत वितरण अब पुराने पड़ गये हैं। प्राकृतिक तथा मानवकृत भूकंपी की लहरों की गति तथा उनके भ्रमण पथ के वैज्ञानिक अध्ययन एवं विश्लेषण के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भाग को तीन वृहत् मंडलों- क्रस्ट, मैण्टिल एवं अंतरतम (क्रोड) में विभक्त किया जाता है।
भूकंपीय लहरों की गति में अंतर के आधार पर इन तीन प्रमुख मंडलों के उपविभाग किये गये हैं।
प्रश्न : अपक्षयण एक जाटिल परिघटना है, जिसमें अनेक प्रक्रम शामिल हैं और जो विभिन्न कारकों के द्वारा प्रभावित होती है। सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
(2010)
उत्तर : मौसम की विभिन्न स्थैतिक क्रियाओं द्वारा चट्टानों के टूटने-फूटने को अपक्षय कहते हैं। इस क्रिया में चट्टानों का विघटन तथा अपघटन की क्रियाएं सम्मिलित हैं। यह मुख्यतः मौसम के तत्वों द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त जीव-जंतु, पेड़-पौधे तथा मनुष्य भी निरंतर चट्टानों को तोड़ते-फोड़ते रहते हैं। इस प्रकार के अपक्षय को जैविक अपक्षय कहते हैं। अतः अपक्षय तीन प्रकार का होता है।
1.भौतिक अपक्षय या यांत्रिक अपक्षयः इसमें भौतिक क्रिया के कारण चट्टानों का श्रय ....
प्रश्न : एल. सी. किंग द्वारा प्रदत्त प्रवणता विकास पर विचारों पर चर्चा कीजिए।
(2009)
उत्तर : किसी क्षेत्र की भू आकृति विशेषताओं में ढालों का विशेष महत्व होता है। वस्तुतः ढाल का निर्मित स्वरूप कई कारकों से प्रभावित होता है, जिनमें शैल प्रकार, संरचना, अपरदन की दर, इत्यादि है। इन सभी के प्रभाव से ढाल का विकास होता है।

एल.सी. किंग के अनुसार, किसी आदर्श पहाड़ी ढाल के चार प्रमुख भाग होते हैं, जिन्हें ढाल के तत्व कहते हैं, तत्पश्चात, ....
प्रश्न : अपरदन के द्वितीय चक्र के अधीन स्थलाकृतियों में आवश्यक रूप से पाए जाने वाले भूआकृतिक लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
(2009)
उत्तर : अपरदन चक्र में बाधा उत्पन्न होने पर भू-पृष्ठीय ढाल की प्रवणता में अंतर पैदा हो जाता है तथा दूसरा चक्र प्रारंभ हो जाता है। प्रथम चक्र से निर्मित स्थल रूप स्थापित रहते हैं। साथ ही द्वितीय चक्र द्वारा निर्मित स्थलरूप भी प्रथम चक्र के स्थल रूपों के साथ-साथ विकसित होने लगते हैं। इन स्थलाकृतियों में उत्थित समप्राय मैदान, अधःकर्तित विसर्प एवं गोखुर झीलें तथा निक प्वाइंट इत्यादि हैं।
प्रश्न : भू-आकृतिक चक्र की संकल्पना का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और डब्ल्यू. एम. डेविस और डब्ल्यू. पेंक के विचारों पर चर्चा कीजिए।
(2008)
उत्तर : भू-आकृति चक्र से तात्पर्य है कि किसी भी भू-दृश्य का एक निश्चित इतिहास होता है। जब अपरदन के दूत इस भू-दृश्य पर कार्य करते हैं तो उसमें समय के साथ अनेक परिवर्तन होते हैं। परिवर्तन का एक सुव्यवस्थित क्रम होता है जिसके फलस्वरूप प्रारम्भिक स्थलाकृतिक अनुक्रमिक आकृतियों से गुजरते हुए अन्त में अन्तिम आकृति में परिवर्तित हो जाती है। जेम्स हट्टन के पृथ्वी के इतिहास से संबंधित चक्रीय प्रकृति की अवधारणा और चार्ल्स डार्विन के ....
प्रश्न : समस्थिति की संकल्पना की परिभाषा कीजिए तथा एयरी और प्रैट के अभिगृहीतों पर चर्चा कीजिए।
(2007)
उत्तर : समस्थिति भूपृष्ठ के विभिन्न तैरते हुए ब्लाकों के मध्य संतुलन की दशा है।* समस्थिति या आइसस्टेसी शब्द ग्रीक भाषा के आइसस्टेसिओस (ISOSTASIOS) से बना है] जिसका अर्थ है समान स्थिति। जिसकी जानकारी 1855 ई- में प्रैट ने अपने विचारों में प्रस्तुत की थी] पर इसका नामकरण डटन नामक अमरीकी भूविज्ञानी ने सन् 1889 ई- में किया और इसे समस्थिति अथवा आइसस्टेसी का नाम दिया। इसका आशय यह है कि पृथ्वी की सतह पर उपस्थित असमान ....
प्रश्न : ए. वेगनर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें।
(2006)
उत्तर : महाद्वीपों के प्रवाहित होने की संभावना का संकेत सर्वप्रथम एन्टोनियो एनाइडर ने 1858 ई. में दिया था। टेलर ने 1910 ई. में महाद्वीपीय प्रवाह की परिकल्पना के आधार पर मोड़दार पर्वतों के वितरण को स्पष्ट करने का प्रयास किया। परंतु सर्वप्रथम वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन को एक सिद्धांत के रूप में रखा तथा इसके समर्थन में कई महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किया। वेगनर ने विश्व के विभिन्न भागों में हुए जलवायु परिवर्तन को महाद्वीपीय विस्थापन द्वारा ....
प्रश्न : पृथ्वी की आंतरिक दशा के अध्ययन में भूकंपीय तरंगों की भूमिका।
(2005)
उत्तर : भूकंप-विज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भूकंपीय लहरों का सीस्मोग्राफ यंत्र द्वारा अंकन किया जाता है। यही एक ऐसा प्रत्यक्ष साधन है, जिससे पृथ्वी के आंतरिक भाग की बनावट के विषय में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध होती है।
जिस जगह से भूकंप का कंपन प्रारंभ होता है उसे भूकंप मूल (focus) कहा जाता है तथा जहां पर भूकंपीय लहरों का अनुभव सबसे पहले किया जाता है, उसे भूकंप केंद्र कहते हैं। भूकंप के दौरान पृथ्वी में कई प्रकार ....
प्रश्न : स्थलाकृतियों के उद्भव में संरचना एक प्रमुख नियंत्रक कारक है। उपयुक्त उदाहरणों के साथ विवेचना कीजिए।
(2005)
उत्तर : किसी भूदृश्य के विकास में उसकी संरचना का महत्व सर्वोपरि है, किंतु साथ-साथ अपरदन के प्रक्रम तथा विकास की अवस्था का भी स्थलाकृतियों के उद्भव पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर डेविस ने कहा है कि स्थलाकृतियों का उद्भव संरचना, प्रक्रम तथा अवस्था का प्रतिफल है। वास्तव में, किसी भी भूदृश्य के विकास में यही तीन प्रमुख नियंत्रण कारक हैं। इन तीनों में भी संरचना स्थलाकृतियों के विकास का प्रमुख ....
प्रश्न : अंतर्जात बलों के फलस्वरूप बनी भू-आकृतियों का वर्णन कीजिए।
(2004)
उत्तर : ऐसी बहुत सी भूगर्भिक प्रक्रियाएं, शक्तियां एवं इनके द्वारा जनित संचलन हैं जो पृथ्वी पर भूगर्भिक पदार्थ तथा विभिन्न प्रकार के उच्चावच लक्षणों के निर्माण, विनाश, पुनर्निर्माण तथा संवर्धन में लगे रहते हैं। इन बलों को दो विस्तृत विभागों में बांटा जाता है - अंतर्जात बल तथा बहिर्जात बल। पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल को अंतर्जात बल कहा जाता है। पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल बहिर्जात बल कहे ....
प्रश्न : तटीय क्षेत्रों से संबंधित स्थलाकृतियों के क्रमिक विकास की व्याख्या कीजिए।
(2003)
उत्तर : तटीय प्रदेशों में स्थलाकृतियों के विकास के दूत के रूप में मुख्यतः समुद्री तरंग कार्य करते हैं। इसका आधार भी बहते हुए जल की तरह समुद्र तल ही होता है। तटीय प्रदेश के ऊपरी भाग में मुख्यतः अपरदनात्मक स्थलाकृति का विकास होता है, जबकि निम्न भाग में निक्षेप से निर्मित स्थलाकृतियों का विकास होता है। कई भूगोलवेत्ताओं द्वारा तटीय अपरदन चक्र का सिद्धांत भी दिया गया है। इसमें सबसे पहला सिद्धांत गिलवर्ट-लोबेक द्वारा दिया गया ....
प्रश्न : भू-अभिनति
(2002)
उत्तर : साधारण अर्थ में भू-अभिनति का तात्पर्य जल-पूर्ण गर्त से लिया जाता है जिसमें तलछट का जमाव होता रहता है, जिस कारण उनकी तली निरन्तर नीचे धंसती जाती है। परिणामस्वरूप अधिक गहराई तक अवसादों का जमाव हो जाता है। भू-अभिनति लम्बा, संकरा तथा उथला जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटीय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है।
भू-अभिनति की संकल्पना का विकास वलित पर्वतों की व्याख्या के समय किया गया है। इस क्षेत्र में प्रथम सराहनीय ....
प्रश्न : डेविस द्वारा प्रतिपादित भौगोलिक चक्र मॉडल की समालोचना कीजिए।
(2002)
उत्तर : डेविस महोदय ने सर्वप्रथम 1899 ई. में भौगोलिक-चक्र की संकल्पना का प्रतिपादन किया। तथा इसके अनुसार भौगोलिक चक्र समय की वह अवधि है, जिसके अन्तर्गत कोई उत्थित-भूखण्ड अपरदन के प्रक्रम द्वारा प्रभावित होकर एक आकृति-विहीन समतल मैदान में बदल जाता है। इस तरह डेविस ने स्थल रूपों के विकास में चक्रीय पद्धति का अवलोकन ऐतिहासिक परिवेश में किया। उन्होंने बताया कि स्थल स्वरूपों के निर्माण एवं विकास पर संरचना, प्रक्रम तथा समय का प्रभाव होता ....
प्रश्न : भू-संतुलन सिद्धांत का एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
(2001)
उत्तर : भू-संतुलन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डटन द्वारा किया गया। भू-पटल के विस्तृत खंड जैसे महाद्वीप, सागरीय नितल, पर्वत, पठार, मैदान आदि अलग-अलग ऊंचाई रखते हुए भी तीव्र गति से परिक्रमण एवं घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर संतुलित रूप से स्थित हैं। भू-पटल अपेक्षाकृत अधिक घनत्व से निर्मित प्लास्टिक दुर्बलमंडल पर तैर रहा है। तैरते हुए भू-पटल के विभिन्न खंडों के मध्य स्थित संतुलन की आदर्श दशा को ही भू-संतुलन कहा जाता है। 1855 ई. में ....
प्रश्न : प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के हवाले से, संसार के तरुण वलित पर्वत तंत्रों की उत्पत्ति और वृद्धि को स्पष्ट कीजिए।
(2000)
उत्तर : पर्वत तंत्रों की उत्पत्ति एक बहुत ही व्यापक व संश्लिष्ट सिद्धांत है जो पृथ्वी पर महासागरों और महाद्वीपों, पर्वतों और गर्तों तथा पर्वत निर्माण के क्षेत्रों के वितरण एवं उनकी विभिन्न प्रक्रियाओं की सर्वाधिक तर्कसंगत एवं सुस्पष्ट व्याख्या करता है। इस सिद्धांत के अनुसार स्थलमंडल अनेक दृढ़ खंडों में बंटा हुआ है, जिसे प्लेट कहते हैं। इन प्लेटों की औसत गहराई 100 से 150 किमी. होती है। ये प्लेट दुर्बलमंडल के प्लास्टिक सतह पर सतत ....
प्रश्न : भू-आकृतिक प्रक्रम।
(1999)
उत्तर : भू-आकृतिक प्रक्रम के अंतर्गत उन सभी भौतिक व रासायनिक परिवर्तनों को शामिल किया जाता है जो पृथ्वी की सतह में परिवर्तन लाते हैं। एक भू-आकृतिक कारक कोई भी ऐसा प्राकृतिक माध्यम हो सकता है, जिसमें पृथ्वी के पदार्थों को स्थानांतरित करने की क्षमता हो, जैसे-बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमनद, वायु, लहरें, तरंगें, ज्वार, सुनामिस आदि। ज्यादातर भू-आकृतिक कारकों की उत्पत्ति पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर होती है तथा ये गुरुत्वबल से प्रभावित व निर्देशित ....
प्रश्न : ‘महाद्वीपीय विस्थापन’ सिद्धांत और ‘प्लेट विवर्तनिक’ सिद्धांत के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए
(1999)
उत्तर : महाद्वीपों एवं महासागरों के स्थायित्व से संबंधित परिकल्पनाओं के विरोध में ही ‘महाद्वीपीय विस्थापन’एवं ‘प्लेट विवर्तनिक’सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया। कहना न होगा कि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत ने महाद्वीपीय प्रवाह के सिद्धांत को संपुष्टि प्रदान की है। हालांकि दोनों सिद्धांत प्रवाह पर एकमत हैं, फिर भी दोनों में कई मतभेद भी पाये जाते हैं। इन अंतरों को समझने के लिए इन्हें निम्न वर्गों में बांटा जा सकता हैः
1. प्रवाहित खण्डः महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के ....
प्रश्न : ज्वालामुखीयता की संकल्पना पर चर्चा कीजिए और दर्शाइए कि प्लेट विवर्तनिकी का सिद्धांत किस प्रकार ज्वालामुखीयता और ज्वालामुखी उद्गारों की क्रियाविधि को स्पष्ट करता है?
(1998)
उत्तर : भूगर्भशास्त्र में ज्वालामुखी, ज्वालामुखी के प्रकट होने की क्रिया व ज्वालामुखीयता में पर्याप्त अंतर बताया जाता है। ज्वालामुखी प्रायः एक गोल या कुछ गोल आकार का छिद्र अथवा खुला भाग होता है, जिससे होकर पृथ्वी के अत्यंत तप्त भूगर्भ से गैस, तरल लावा, जल एवं चट्टानों के टुकड़ों से युक्त गरम पदार्थ पृथ्वी के धरातल पर प्रकट होते हैं।

इसके विपरीत, ‘ज्वालामुखीयता वह क्रिया ....